रविवार, 13 जनवरी 2013

कब तक करूं मै इंतजार, तेरे ज़वाब का ,
कहीं चेहरा ही न बदल जाये, मेरे ख्वाब का।

पहले तो नहीं थी सुर्खरू ,प्यार की शिद्दत इतनी ,
उलझन बढ़ी  जब चर्चा हुई ,तेरे मेरे  इंतखाब का। 
 .
गर दिल को बना लेते जुबाँ ,अल्फाज़ सज़ा लेते ,
ना होता ज़माने को इंतजार ,तुमसे किसी ज़वाब का।

ना होती सरे बाज़ार  रुशवा,हमारी  मुहब्बत इस तरह ,
गर सलीके से किया होता 'एहतराम' फर्ज़े -हिज़ाब  का।

'कमलेश' था खुली किताब ,कोई भी पढ़ लेता कभी ,
पर तुमने बना  दिया  इसे भी, 'पन्ना' बंद किताब का।।

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kamlesh